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Monday, 30 September 2019

कविता


अक्सर तुम कहते थे।
“अच्छा होता हम मिले ना होते!”

मैं कहता थी ...
“मिलकर… इतना बुरा भी तो नहीं लगा!”

अक्सर तुम कहते थे
कि मैं बहुत बुरा हूँ
और उसी वक़्त मेरे कंधे पर ..
तुम्हारा सिर रख देना
सारा व्याकरण बिगाड़ देता था।

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मुझे मोक्ष की नहीं मोह की प्यास है।
तुम मेरे होठों पर रहो बासुरी की तरह।
यों ही गूँजते रहें प्रेम का स्वर
यों ही ताकती रहू तुम्हें,
यों ही होता रहे प्रेम का मृत्युंजय जाप
कि बजती रहे प्रेम की बाँसुरी
मैं सुनते रहूँ मैं जन्मों तक..

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तुम्हारा अक्स ,,,तुम्हारा साया 
नए पुराने रिश्तों का एक अछूता मेल 
यादों के भटके हुवे जुगनू 
सफ़ेद कागज पर चंद अधूरे लफ्ज 
ख्वाबों का जमावड़ा 
कुछ जिंदा उमीदें 
मगर ये क्या ????
कुछ लिख नहीं पा रही हूँ मै
न जाने कबसे खामोश है लफ्ज
शायद खुद से छूटने  का और ..
तुम तक पहुँचने का रास्ता है 
तुम लफ्जों  दुनिया में कही खो गए हो ..

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Pradnya Rasal


Sunday, 30 June 2019

कुछ कविता

बचे हुए रंगों में से
किसी एक रंग पर
उँगली रखने से डरती हूँ

मैं लाल, नीला केसरिया या हरा
नहीं होना चाहती 

मैं इन्द्रधनुष होना चाहती हूँ
धरती के इस छोर से
उस छोर तक फैला हुआ

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मैं कड़कती धूप हूं, मुझे छाया की तलाश है।
मैं प्यास हूं, मुझे पानी की तलाश है।
मैं बियाबान वीरानी हुं, मुझे घर की तलाश है।
मैं अकेली हूँ, साथी की तलाश है।
मैं........खैर जाने दो,
अपनी ही छाया में खड़ी हूंअपने से गले लगाकर रोना .........
नही,,,इतनी आसानी से नही रोती मैं,।मैं तो बाज़ हूं, जो जख्मी होकर दरख़्त की सबसे ऊंची टहनी पर जा बैठता हैं, चुपचाप, अकेला।
अपने ही जख्मों से शर्मसार.......

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मैं पेड़ बन जाऊं, तुम बरसना मुझपर,
धुँवाधार...
मेरी शाख, पात, तना, डाल सारी सारी तुम्हरे नीले पन में समाने दो,
और एक नई उम्मीद जागे, कुछ सपने पले,
सारे सपने मैं रखूंगी संजोकर,
सुखाउंगी उन्हें सांसों की आंच पर,
फिर उन्ही सपनों के तले,
अपना बीज बोऊँगी,,
तुम आना बरसात बनकर,,,
फिर एक बार,
हमारे सपनों के रंग देने...!

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Pradnya Rasal

Sunday, 28 April 2019

कविता

गाँव में बिजली जाने पर
बच्चे गिनते हैं गिनती सौ तक
इस उम्मीद में कि
सौ तक आते-आते
आ जाएगी बिजली
और नहीं आने पर
फिर से लौट आते हैं
शून्य पर
सौ तक जाने को
वैसे ही,गिनती गिन रही हूँ
मैं भी तुम्हारे इंतज़ार में
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आरिज़ों का रंग उतरा, फ़ीका दुपट्टा पड़ गया
इक तेरे मिलने की ख़्वाहिश,में तीसरा फ़ागुन गया
मोगरा,जूही की लड़ियाँ, बोगुनविल्या की क्यारियाँ
ज़हन का पन्ना है ख़ाली, किताबों भरी अलमारियां
चम्पा सन्दल, चमेली, मुश्क कितने चख लिए
इक तेरी खुशबू न पाई, शौक़ लाखों रख लिए
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क्या गम का साया
इतना ताकतवर हो गया
पैरो को शिथिल कर गया
आत्मा को बेजान के दिया....
पहले तो ऐसा ना था
सुन ले मेरे दिल
मैं वो जिंदा लाश नहीं
अपनी मायूसी पर रो दूँ.....
नहीं हारना मुझे
इन छोटे-छोटे हालात से
मंजिल पास नहीं
इतनी भी दूर नहीं
की छू ना सकू......
उठ रीना
हाथ बढ़ा
जब चलेगी मंजिल की ओर
अफसोस होगा दूर
छू लेगी अपनी
ख्वाहिशों को........
तुम
हाथ तो बढ़ाओ.

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Pradnya Rasal

Wednesday, 20 February 2019

कविता

काँच के आसमानी टुकड़ों में पिघलता हुवा आसमान,
उसपर बिछलती सूरज की करुणा 
मैं सबको सहेज लेती हूं,,
क्यों कि .....
मेरे खिड़की के आठों कांच सुरक्षित है।
और सूर्य की करुणा 
मेरे मुंडेर पर रोज़ बरसती है।

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ऐ ज़िन्दगी,
तेरी इन मगरूरियों का चुन चुन कर हिसाब करूंगी,
कुछ देर से ही सही लिख लिख कर तेरा ज़र्रा ज़र्रा साफ करूंगी।
आज कर ले हुक़ूमत तेरा दौर है,
जिस रोज़ राबता हुए तेरा मुझसे से,
लिख कर ले ले तेरा नामोनिशान ज़िन्दगी से साफ करूंगी।

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तलवार तो आदमी का क्रोध भी उठा लेता है
 पर
 किताब आदमी को ख़ुद उठानी पड़ती है 
 मैं अपनी बहादुरी पर ख़ुश हु...

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Pradnya Rasal

Friday, 1 February 2019

कुछ और पंक्तियां

कुछ लोग जीते है ..
आगे के समय में ,,
मर जाने के लिए ..
आब तक तो मै जी रही हूँ 
पिछले समय में 
मार चुकी हूँ कई बार 
जिससे तुम मिले हो ...
मिलते हो ,,
बात करते हो ,,
वो तो एक लाश है ,,
एक ऐसी लाश ,,,
जिसे तुम जिंदा करने की कोशिश करते हो ..

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Pradnya Rasal

Ahmednagar, India

Thursday, 17 January 2019

जिंदगी एक रंगमंच है

जिंदगी एक रंगमंच है,
हर किरदार का अपना अंश है.
कयी अपने छोड जाते है,
कयी नये मुस्कुरा देते  है.
छोड गये वो सिखा देते  है,
रेह गये वो साथ देते  है.
सीख गये तोह जीत गये,
ये ना सोचो, क्यू छोड गये.
साथ दिये उन्हे सहजके रखे ,
सर आखों पर बिठाके रखे.
छोड गये वो खुश रहे,
उनपर भी हमे नाझ रहे.
जब ताक सांसे है, हमे जिना है,
घुंट गम के हो या ख़ुशी के, हस्ते पिना है.
उमीद करोगे तोह पचताओगे,
मन खुला रखोगे तोह पाओगे.
पाना खोना जारी रहेगा,
हिम्मत खोना भारी पडेगा.
हर सुबह सुनेहरी किरण की तरह,
जिंदगी जियो किचड में नीरज की तरह.

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Sarala Bhagat,

Dombivli, India